Sunday, April 8, 2018

लोकतांत्रिक बाबा


बच्चा छोटा हो तो सबसे पहले बोलने की कोशिश में म के बाद ब शब्द ही बोलता है,म से मां, मामा आगे बढ़ता है,और ब से बा और बाबा ... तब बाबा घरेलू न्याय किया करते थे ...
मामा से डर नहीं लगता मगर बाबा शुरू से डराने की कैटेगरी में शामिल हो जाते हैं ...
बाबा .....साधू बाबा ..को देख देख कर बड़े होते हुए हम अब ...स्वतंत्र लोकतंत्र  में लोकतांत्रिक बाबा से डरने लगे हैं ...डरें भी क्यों नहीं ..बड़ी साधना करते हैं ये साधन जुटाने में ......
.इनके दिन ब दिन कारनामें,चमत्कार से कोई काम होते हैं क्या? किसी को अंदर-बाहर करते करते किसी को कब गायब कर देते हैं कोई कभी जान नहीं पाया अब तक .....इनका पावर सदा बढ़ता हुआ ही प्रतीत होता है ...जितने भी पुराने बाबा होते जाते हैं अपने चेले चपाटों को अपनी थोड़ी थोड़ी पावर बाँटते रहते हैं ,हालांकि ये भी उतना ही सच है कि यही चेले चपाटे एक दिन अपने बाबा को रौंदते हुए ऊपर कूच कर जाते हैं फिर अंत बड़ा दर्दीला हो जाता रहा है ऐसे लोकतांत्रिक बाबाओं का ....
राम भरोसे रहने वाले इन बाबाओं के नामों में कभी राम आगे तो कभी पीछे जुड़ा रहता है कभी कभी राम अपने साथी रहीम को भी जोड़ लेते हैं  कभी देव को ...लोगों को ये राम राम करवाते रहते हैं जाने कितने अपनी रामरोटी इनके भरोसे सेकते हैं ....आशा रहती है राम सब भला करेंगे पर न आशा बचती न आशाराम ...रोटी सेकते हुए ....
फिर लोकतंत्र में जो जाने लोक के तंत्र का मंत्र वो बाबाओं की अलग केटेगरी को प्राप्त कर लेता है यानि मंत्री कहलाता है ...इनके दिमागी फितूर भी बाबाओं से बीसा ही होते हैं  .... अब लोकतांत्रिक बाबाओं का जमाना आ गया है ....न राम रहे न रहीम न कोई  साधू न बापू.....
न न्याय न न्यायपालिका,न साध्वी न साधिका ....
अब बचा है बस डर जनता के दिल में ....
लोकतंत्र भी लोकतांत्रिक बाबाओं की चपेट में हैं .....
हम भी जपें या कहें राम राम ,आप भी जपें या कहें राम-राम ....
#व्यंग्यकीजुगलबन्दी

Thursday, March 15, 2018

दो कथाएँ

1-

चिन्दी

अरे ओ चिन्दी.... इधर तो आ......
जोर जोर से आवाज लगा रहे थे....अस्पताल के वार्ड में उसको.....और चिन्दी है कि ये उड़ी और वो उड़ी फिर रही थी हर मरीज के बिस्तर के पास.....सॉकेट में मच्छर भगाने की टिक्की डालने को....
पुनम्मा नर्स के साथ ये काम करने में बहुत खुश हो जाती है वो.......
घूड़े के ढेर पर चिथड़ों में  लिपटी मिली थी 3 साल पहले.....तब से यही नाम पड़ गया.......चिन्दी....पुनम्मा की पूँछ......चिन्दी!

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2-

नई सुबह

वो आज फिर पन्नी उठाए घूम रहा था...स्कूल की यूनिफॉर्म पहने......
मुझे देखते ही बोल पड़ा ......जा रहा था स्कूल, मगर रात बहुत चढ़ा के आया बाबा......माँ को बहुत पीटा....अब दोपहर तक सोया पड़ा रहेगा........माँ के पैर में दर्द है और आज काम पे नहीं जा पाएगी.....
एक टैम खाना भी तो डालनाइच् पड़ेगा न पेट में.......
और मैं मांगे पैसे की नहीं खाऊंगा रोटी........
.
.
बाय कहा मैंने ...कल फिर मिलेगा...
नई सुबह तो होगी ही......

Tuesday, January 23, 2018

कुछ प्रश्न जो किये गए मुझसे ,उनके उत्तर मेरे

प्र. 1) आपका ब्लॉगिंग के प्रति रूझान कैसे पैदा हुआ, पहली बार आपने ब्लॉगिंग कब की? 

उत्तर – जब मेरे बच्चे बड़े होकर इंदौर से बाहर पढ़ने चले गए तो स्कूल से आकार बहुत खालीपन लगता था , समय बहुत होता था ।टी. वी. देखने में रूची नहीं रहीं ,नेट नया-नया था जीमेल पर चेट करना सीखा था ,छुट्टियों में जब बच्चे घर आते तो कहती कि –इतनी सारी बातें रहती है तुम लोगों को बताने की मगर तुम्हारी छुट्टियाँ ही खतम हो जाती है,समय ही नहीं बचता सामान्य कामों के बीच ,मेरे छोटी बहन रचना बजाज तब लिखती थी,उसने तो 2006 में ही बना लिया था, और उसका ब्लॉग हम पढ़ते थे ... मैं भी कुछ लिखने कि कोशिश करने लगी थी कॉपी में .....बेटे ने तब खुद का चित्रों वाला ब्लॉग बना लिया था कहा- आपका भी एक ब्लॉग बना देता हूँ ,आप जो भी लिखना हो उस पर लिख दिया करो, और बस ये ब्लॉग बन गया –मेरे मन  की । 2008 में ...

प्र. 2) भाषा, अभिव्यक्ति व प्रतिक्रियाओं की दृष्टि से ब्लॉगिंग करने का आपका प्रथम अनुभव कैसा रहा? 

उत्तर – भाषा बोलचाल की है तो लिखने में कोई परेशानी नहीं थी।जो मन में आता है वही लिखना था, तो बहुत अच्छा और आसान लगा ,प्रतिक्रियाएँ भी प्रोत्साहित ही करती थी ... बढ़िया अब तक

प्र. 3) आपको पहली बार ब्लॉग पोस्ट पर हिंदी टाइप करने में किस प्रकार की समस्या आई और उस समस्या का समाधान आपको कहाँ से मिला? 

उत्तर- जैसा कि बताया मेरे छोटी बहन लिखती थी तो उसने बता दिया था बारहा के बारे में ।तभी से उसका ही प्रयोग करती हूं , कोई समस्या नहीं रही ...अब तो गूगल हिन्दी इनपुट भी आसान है ...

प्र. 4) ब्लॉगिंग में ऐसी क्या खास बात है, जो आप इसे अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों से बेहतर मानते हैं?

उत्तर- कोई समय की पाबंदी नहीं , लेखन सीमा की पाबंदी नहीं ,जब मन हो,जैसा मन हो खुद को व्यक्त कर सकते हैं ....मन की बात ड्राफ्ट के रूप में सहेज सकते हैं,श्युडूल कर सकते हैं,लेबल कर सकते हैं , टेक्स्ट,फोटो ,वीडियो,audio कुछ भी तरीके से खुद को व्यक्त कर सकते हैं , हालांकि अब भी एमपी3 सीधे अपलोड की सुविधा नहीं है ...और फेसबुक से पहले ब्लॉग बनाया तो वही अब भी बढ़िया है |

प्र. 5) आप किस प्रकार के ब्लॉग लिखते है। आपके ब्लॉग के विषय व सामग्री के बारे में कुछ बताए?

उत्तर- मैं जो मन में आता है वही अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर देती हूं ,चाहे संस्मरण हो,चाहे,दो लाईन .कहानी,या कविता ...मेरा ब्लॉग विषय आधारित नहीं है , सब विधाओं कि अभिव्यक्ति है, बहुत प्रयोग किए .....मैंने पॉडकास्ट पोस्ट किए जो बहुत पसंद किए गए ..... बाकी आप देख सकते हैं- “मेरे मन  की ”पर 

प्र. 6) आपके पसंदीदा प्रमुख ब्लॉग कौन-कौन से और क्यों है?

उत्तर- बहुत से ब्लॉग हैं जिन्हें पसंद करती हूं ,नाम गिनाए नहीं जा सकते ,कोई एक कभी भी हमेशा पसंद रहा ऐसा नहीं  ,जो मेरे रूची से मेल रखते हैं – गीत-संगीत ,कहानी,कविताओं ,औडियो ब्लॉग और विज्ञान की जानकारी वाले ब्लॉग पसंद हैं ...

प्र. 7) एक ब्लॉगर होने के नाते पाठकों की प्रतिक्रियाओं पर आपका उनसे संवाद किस तरह का होता है? 

उत्तर-मैंने बहुत पहले ही ब्लॉग बनाया है ,प्रतिक्रियाएँ पढ़कर संवाद हो ऐसी स्थिती आई नहीं ....लेकिन उनसे मेल या चेट के माध्यम से संवाद हुआ /होता है .....

प्र. 8) क्या आपको लगता है कि अश्लीलता, सांप्रदायिकता व फूहड़ता की भेंट चढ़ने से बचाने के लिए ब्लॉंग पर भी किसी प्रकार का नियंत्रण होना जरूरी है?  

उत्तर-ब्लॉग अभिव्यक्ति कि स्वतन्त्रता का एक सशक्त माध्यम है .... ये व्यक्ति को स्वनिर्णय लेना होता है कि वो सबके साथ किस तरह से व्यक्त हो रहा है .... अगर एक मंच हो जिसपर सारे ब्लॉग आपस में जुड़े हों तभी नज़र रखने व नियंत्रण रखने की बात आती है .... ब्लॉक करने जैसा ऑप्शन हो तो रोक लगाने में आसानी हो सकती है .... अगर बेहतर कल की कल्पना है तो होना चाहिए |

प्र. 9) हिंदी भाषा व साहित्य के विकास में ब्लॉग का क्या योगदान है?

उत्तर – बहुत आसानी से बहुत सा साहित्य उपलब्ध हो रहा है हिन्दी में , लोग आपस में जुड़ रहे हैं ।हिन्दी भाषा आधारित ब्लॉग भी बने हैं .... खासकर ऐसे ब्लॉग हैं जहां लेखकों का कृतित्व आसानी से पढ़ने को उपलब्ध है ....प्रसार तो हुआ है |

प्र. 10) क्या कारण है कि अधिकांश हिंदी ब्लॉग अधिकतम तीन या चार वर्षों में ही आए-गए हो जाते हैं? 

उत्तर –आए-गए से क्या मतलब है ? लेखन सामग्री तो वहीं हैं ,फिर भी एक ऐसा मंच हो जहां ब्लॉग पोस्ट के प्रकाशन कि सूचना तुरंत उपलब्ध हो तो शायद सबको ब्लॉग तक पहुँचने में आसानी हो ... जैसे ब्लॉगवाणी था …

प्र. 11) क्या पत्रकारिता की तरह ब्लॉगिंग में भी कॅरियर निर्माण की संभावनाएँ है। इस बारे में कुछ बताएं? 

उत्तर – जिस तरह  पत्रकारिता होने लगी है उसे देखकर तो तो कैरियर निर्माण जैसा कुछ लगता नहीं ..... हां ब्लॉगिंग में कैरियर निर्माण की संभावनाएं असीम है :-)

 प्र. 12 ) हिंदी के साथ-साथ आंचलिक भाषाओं के ब्लॉग का आप क्या भविष्य देखते हैं?

उत्तर – आंचलिक भाषा के ब्लॉग अपनी संकृति सहेजने का बेहतर माध्यम हैं .... आने वाले समय में बहुत जानकारी एकत्रित मिलेगी रोटी कमाने के लिए अपने अंचल से दूर जा बसे लोगों को अपनी पीढ़ियों को बताने को ,अपनी जड़ों से जुडने को ....

प्र. 13) हिंदी ब्लॉगिंग के भविष्य के बारे में आपका क्या कहना है? 

उत्तर – बहुत ब्लॉग बन रहे हैं , लोग लिखना सीख रहे हैं , खुद को व्यक्त कर पा रहे हैं ...घरेलू महिलाएं भी आगे आकर खुद को व्यक्त कर पा रही है , बेहतर ही है ...कल से बेहतर आज है ,आज से ज्यादा बेहतर आनेवाला कल होगा  

प्र. 14) आपकी राय में ब्लॉग की सबसे बड़ी खूबी व सबसे बड़ी खामी क्या है?

उत्तर – अपनी बात अपनी भाषा ,में कह पाना इसकी खूबी है , खामी ये कि सारे ब्लॉग के लिए एक ही मंच का न होना .... 

प्र. 15) हिंदी ब्लॉगों को प्रचारित करने व बेहतर बनाने के लिए आपके तीन प्रमुख सुझाव क्या है? 

उत्तर- 1-जो लोग लिख रहे हैं ,सतत लिखें, अपने ब्लॉग में पसंदीदा ब्लॉगरोल रखें, सबसे ज्यादा समाज के लिए उपयोगी लिखें तो लोग आपको पसंद करते ही हैं .....

2-मेरे ब्लॉग पोस्ट प्रकाशित होते ही फेसबुक पर औटोमेटिक लिंक पोस्ट होती है,.वैसे सारे ब्लॉग जुड़े हों कई सारी साइट्स से 

3- और बेहतर बनाने के लिए मुझे औडियो सीधे पोस्ट करने की सुविधा चाहिए ... 

प्र. 16) एक ब्लॉगर होने के नाते आप नवोदित और स्थापित ब्लॉगरों को क्या संदेश देना चा‍हते हैं?  

उत्तर – स्थापितों को तो यही की –आपसे ही नवोदित लिखना सीख रहे हैं ,तो ब्लॉग पर लिखना जारी रखें ,अनुभव साझा करें  और नयों को प्रोत्साहन दें .... और नवोदितों को ये कि लिखने से पहले बहुत सा पढ़ें ..... प्रतिक्रियाओं को हमेशा सम्मान दें और सही उत्तर.... भाषा सदैव सब उम्र के पठन योग्य रखें... और समाज को कुछ बेहतर बनाने के लिए ब्लॉग का उपयोग करें |

Monday, January 22, 2018

शरद कोकास जी की लंबी कविता और उसका सस्वर वाचन स्वयं शरद जी द्वारा, भाग -2

अपने ब्लॉग के पाठकों के लिए मैं शरद कोकास जी की कविता ' देह ' के यह पंद्रह ऑडियो और उनके साथ कविता की स्क्रिप्ट प्रस्तुत कर रही हूँ । आज प्रस्तुत है द्वितीय भाग  और उसका ऑडियो । आप कविता पढ़ने के साथ साथ उसे सुनने का आनंद भी ले सकते हैं । ऑडियो में शरद कोकास की आवाज़ है और पार्श्व में है पियानो का संगीत ।



*शरद कोकास की लम्बी कविता 'देह'*

_ *भाग 2* _
*देह* और जीवन की सहयात्रा जो सहस्त्राब्दियों से जारी है
जहाँ एकाकार हो चली मनुष्य की शक्लों में झिलमिलाता है
किसी जाने पहचाने आदिम पुरखे का चेहरा
आज के मनुष्य की देह तक पहुँचने से पहले
जाने कितनी यंत्रणाओं से गुजरी होगी उसकी देह
किस तरह अपनी क्षमता और आश्चर्यों से उबरकर
दैहिक नियमों के सूत्र रचे होंगे उसने
किस तरह सिध्द की होगी देह में जीवन की उपयोगिता
कैसे गढे गए होगें स्त्री-पुरुष अंगों के अलग अलग आकार
और जीवन में उनकी भूमिका तय की गई होगी

*आइने* में अपने चेहरे पर तिल देखते हुए
क्या हम सोच सकते हैं हमारे किसी पूर्वज के चेहरे पर
ठीक इसी जगह रहा होगा ऐसा ही तिल
हमारे हँसने मुस्कराने खिलखिलाने में
हमारी किसी दादी नानी की मुस्कुराहट छिपी होगी
हमारे किसी परदादा के माथे पर
ठीक उसी जगह बल पडते होंगे
जिस तरह हमारे माथे पर पडते हैं
*समय* के आंगन में अभी कल तक तो थीं
हमारे विस्मृत पुरखों की परछाइयाँ
जो उनकी देह के साथ ही अदृश्य हो गईं
जानना तो क्या सोचना भी बहुत मुश्किल
कि वे ठीक हमारी तरह दिखाई देते थे
हमारे अवयवों की तरह हरकतें होती थीं जिनके अवयवों मे
हमारे देहलक्षणों की तरह थे जिनके देहलक्षण
और उनका भी वही देहधर्म था जो आज हमारा है ।
*शरद कोकास*
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Monday, January 15, 2018

शरद कोकास जी की लंबी कविता और उसका सस्वर वाचन स्वयं शरद जी द्वारा, भाग -1

नमस्कार साथियों
आप सबके लिए एक श्रृंखला प्रकाशित करने जा रही हूँ ,ऑडियो के साथ
शरद कोकास जी की लंबी कविता "देह" और उसका सस्वर वाचन स्वयं शरद जी द्वारा -
शरद कोकास का परिचय


                                                                     
श्री शरद कोकास नवें दशक के समकालीन कवि और एक महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण और इतिहास बोध पर लिखी चर्चित लम्बी कविता 'पुरातत्ववेत्ता' के लिए पूरे देश मंं प्रसिद्ध कवि शरद कोकास का जन्म बैतूल मध्यप्रदेश में हुआ । उनकी प्रारंभिक शिक्षा भंडारा तथा नागपुर महाराष्ट्र में हुई और उन्होंने क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय भोपाल से स्नातक तथा विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व में गोल्ड मैडल के साथ परास्नातक की उपाधि प्राप्त की ।
उनके तीन कविता संग्रह अब तक आ चुके हैं लम्बी कविता पुस्तिका “ पुरातत्ववेत्ता“ का प्रकाशन प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका पहल  द्वारा, 2005 में किया गया, इससे पूर्व उनका कविता संग्रह 'गुनगुनी धूप में बैठकर' 1994 में प्रकाशित हुआ तथा 'हमसे तो बेहतर हैं रंग'  2014 में  दखल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ ।
सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविता,कहानी ,समीक्षा और कालम के प्रकाशन के अतिरिक्त नवसाक्षरों हेतु तीन कहानी पुस्तिकायें ,चिठ्ठियों की एक किताब 'कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ' भी उनकी प्रकाशित है ।
हिंदी ब्लोगिंग के प्रारम्भिक दिनों से ही शरद कोकास एक महत्वपूर्ण ब्लॉगर रहे हैं उनके पांच ब्लॉग हैं 'शको कोश ' , 'पुरातत्ववेत्ता' , 'पास पड़ोस' , 'ना जादू ना टोना' और 'आलोचक' ।
एक्टिविस्ट के रूप में अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति नागपुर, साक्षरता समिति दुर्ग आदि अनेक संस्थाओं में कार्य करते हुए “ मस्तिष्क की सत्ता “ विषय पर शरद कोकास विभिन्न  शहरों और संस्थाओं में उनके व्याख्यान भी देते हैं । उनकी व्हाट्स एप विचार श्रंखला 'मस्तिष्क की सत्ता' तथा हिन्दी के ब्लॉग इंटरनेट पर काफ़ी पसंद किये जाते हैं। इसी शीर्षक से उनकी एक पुस्तक भी आ रही  है।
शरद कोकास इस समय गूगल पर सर्च किये जाने वाले प्रमुख व्यक्तियों में से हैं
शरद कोकास की एक महत्वपूर्ण लम्बी कविता ' देह ' विगत दिनों पहल पत्रिका में प्रकाशित हुई है । इस कविता को पंद्रह भागों में विभक्त कर उसके पंद्रह ऑडियो भी उन्होंने बनाये हैं ।

प्रस्तावना -


अपने ब्लॉग के पाठकों के लिए मैं उनकी लम्बी कविता ' देह ' के यह पंद्रह ऑडियो और उनके साथ कविता की स्क्रिप्ट प्रस्तुत कर रही हूँ । आज प्रस्तुत है प्रथम भाग और उसका ऑडियो । आप कविता पढ़ने के साथ साथ उसे सुनने का आनंद भी ले सकते हैं । ऑडियो में शरद कोकास की आवाज़ है और पार्श्व में है पियानो का संगीत ।

*शरद कोकास की लम्बी कविता* 

_ *देह* _

_ *भाग 1* _

*दिन* जैसा दिन नहीं था न रात जैसी थी रात 
धरती की तरह धरती नहीं थी वह 
न आसमान की तरह दिखाई देता था आसमान 
बृह्मांड में गूँज रही थी 
कुछ बच्चों के रोने की आवाज 
सूर्य की देह से गल कर गिर रही थी आग 
और नए ग्रहों की देह जन्म ले रही थी 

*अपने* भाईयों के बीच अकेली बहन थी पृथ्वी 
जिसकी उर्वरा कोख में भविष्य के बीज थे 
और चांद उसका इकलौता बेटा 
जन्म से ही अपना घर अलग बसाने की तैयारी में था
  
*इधर* आसमान की आँखों में अपार विस्मय 
कि सद्यप्रसूता पृथ्वी की देह 
अपने मूल आकार में वापस आने के प्रयत्न में
निरंतर नदी पहाड़ समंदर और चटटानों में तब्दील हो रही है 
रसायनों से लबालब भर चुकी है उसकी छाती 
और मीथेन,नाइट्रोजन,ओषजन युक्त हवाओं में सांस ले रही है वो
*यह* वह समय था देह के लिए 
जब देह जैसा कोई शब्द नहीं था
अमीबा की शक्ल में पल रहा था देह का विचार 
अपने ही ईश्वरत्व में अपना देहकर्ता था वह 
जिसने हर देह में जीन्स पैदा किए 
डी ऑक्सी राइबो न्यूक्लिइक एसिड*1  अपनी सघनता में 
रचते गए पाँव के नाखून से बालों तक हर अंग
जो हर सजीव में एक जैसे होते हुए भी कभी एक जैसे नहीं हुए 
जो ठीक पिता की तरह उसकी संतानों में नहीं आए 
और न संतानों से कभी उनकी संतानों में 

*शिशिर* की सर्द रातों में हमारी देह में सिहरन पैदा करती 
शीतल हवाएँ कल कहाँ थी 
कल यही मिटटी नहीं थी नहीं था यही आकाश 
आज नदी में बहता हुआ जल कल नहीं था 
उस तरह देह में भी नहीं था वह अपने वर्तमान में 
कहीं कुछ तय नहीं था कि उसका कौन सा अंश 
किस देह में किस रुप में समाएगा 
कौन सा अंश रक्त की बूंद बनेगा कौन सा माँस 
पृथ्वी की प्रयोगशाला में 
किस कोशिका के लिए कौन सा रसायन 
उत्तरदायी होगा कुछ तय नहीं था
*पंछियों* की चहचहाहट और मछलियों की गुड़गुड़ाहट  में 
देह के लिए जीवन की वह पहली पुकार थी 
कभी अंतरिक्ष से आती सुनाई देती जो 
कभी समुद्रतलों के छिछले पानी से 
आग्रह था जिसमें भविष्य की यात्राओं के लिए साथ का ।

*शरद कोकास*

******************
सुनिए यहाँ पर - 

अक्षरबद्ध कविताएं -क्षणिक सी

"भ्रमिका"
भ्रम हुआ मुझे
मिल गई जिंदगी!
काश!तुम होते....

"व्यामोह"
व्याधियों से मुक्त हों
मोह बंधन से छूटे
हम सब !

"भंवरजाल"
भंग हुई शांति
वतन की मेरे...
रक्त बहा तुम्हारा
जान गई मेरी ...
लग गई नज़र जाने किसकी?

"भूलभूलैया"
भूल न पाई मैं तुझको
लगा लिया ये कैसा रोग
भुलना होता अगर आसान
लैला-मजनूँ ,हीर-राँझा की
यारियों के किस्से न कहे जाते....
-अर्चना

Sunday, January 7, 2018

सीमा प्रहरी

उन्हें बर्फ़ीली पहाड़ियों में भी गर्मी लगती है
और रेगिस्तान की गर्म हवाएं ठंडक पहुँचाती है
बरसाती बादल उन पर बिजली नहीं गिरा पाते
और उनके त्यौहार हमसे अलग होते हैं ....

परिवार उनका भी होता है पर हम -सा कमजोर नहीं
और ईमानदार मेहनती हैं वे,कामचोर नहीं
तुम्हारा बस नहीं कि तुम उन्हें पहचान भी पाओ
तुम तो बस- "बंदे में था दम" यही गीत गाओ!!!

-अर्चना